माया से कैसे बचें — नाम जप का असली रास्ता
माया से कैसे बचें? श्री प्रेमानंद जी महाराज का उत्तर: जो भगवान भुलाए वही माया। नाम जप से संचित कर्म नष्ट, प्रारब्ध सहज भोगें।

कभी-कभी मन इतना थक जाता है। बस एक सवाल उठता है: माया से कैसे बचें? चारों तरफ से घेरी हुई, हर रोज़ नए-नए रूप में।
माया से कैसे बचें: सबसे पहले माया को पहचानें
श्री प्रेमानंद जी महाराज की भजन मार्ग परंपरा में यह प्रश्न बार-बार उठता है। और महाराज जी का उत्तर हमेशा एक ही रहता है: पहले माया को पहचानो।
हम सोचते हैं पैसा माया है। घर माया है। रिश्ते माया हैं। लेकिन महाराज जी कहते हैं, वस्तु या परिस्थिति खुद से माया नहीं होती।
"वह वस्तु, वह व्यक्ति, वह स्थान, वह घटना, भक्ति जो भगवान की स्मृति करा दे। और जो भगवान की विस्मृति करा दे, वो वस्तु, वो व्यक्ति, वो घटना, वो परिस्थिति, वो माया।"
15:21
पहचान का मापदंड एक ही है। भगवान याद आए तो भक्ति, भगवान भूल जाएँ तो माया। वही परिस्थिति किसी के लिए भक्ति बन सकती है, किसी के लिए माया। फ़र्क भीतर है, बाहर नहीं।
(और यह बात मुझे बहुत देर से समझ आई।) माया बहुत सूक्ष्म है। कोई क्रिया, कोई घटना, और भगवत-चिंतन कहीं छूट गया। संसार का चिंतन शुरू हो गया। बस। माया ने पकड़ लिया।
भैया, यहीं से साधक की यात्रा शुरू होती है। पहचान हो गई तो आधी लड़ाई जीत ली।
फिर एक प्रश्न उठता है: क्या प्रारब्ध हमें माया में फँसने को विवश करता है? और क्या नाम जप इसे बदल सकता है?

क्या प्रारब्ध बदल सकता है? नाम जप से क्या होता है?
सूरज सिंह जी ने सीतापुर से यही पूछा था: "जो नियति में लिख दिया है, उस पर नाम जप का क्या प्रभाव पड़ता है?"
महाराज जी ने संचित और प्रारब्ध का फ़र्क समझाया। जो इस जन्म के लिए भोगने को आया है वह प्रारब्ध है, अमोघ है, व्यर्थ नहीं होगा। "मोग माने व्यर्थ होना, अमोग माने व्यर्थ ना होना।"
वशिष्ठ जी का प्रसंग याद करें। उनके शिष्य के कारण उनकी नाक का प्रारब्ध उनके हिस्से में आ गया। शिष्य बिल्कुल निर्दोष था, फिर भी भोगना पड़ा। यही प्रारब्ध की निश्चितता है। निर्दोष होने पर भी छूट नहीं।
लेकिन यहाँ एक आशा भी है। जो संचित कर्म हैं, भविष्य के बीज जो अभी प्रारब्ध नहीं बने, वे नाम जप से नष्ट हो सकते हैं।
"जो प्रारब्ध नहीं, जो संचित जमा है, वह नष्ट हो जाएगा।"
7:13
मुझे लगता है यही सबसे बड़ा आश्वासन है जो महाराज जी साधकों को देते हैं। और साधना को भी भगवान की कृपा मानकर करें:
"भगवान की कृपा है तो नाम जप हो रहा है। भगवान की कृपा है तो साधना हो रही है।"
14:43
जब ऐसा भाव आता है तो अहम् नष्ट होता है। अहम् नष्ट हो तो संचित कर्म क्षीण होते हैं, धीरे-धीरे। यह तर्क बुद्धि को संतुष्ट कर सकता है। किन्तु भगवान की लीला बुद्धि से नहीं समझ आती। केवल भक्त के अनुभव से।

भगवान की लीला बुद्धि से परे: नामदेव और माधवदास की कथाएँ
संत नामदेव जी की महिमा जब बादशाह तक पहुँची तो उसने रत्नजटित पलंग भेंट किया। नामदेव जी ने उसे नदी में फेंक दिया। बादशाह क्रोधित हुआ। बोला, "पलंग बाहर निकालो!" तो 100 पलंग बाहर आ गए। बादशाह पाँव पर गिरा, माफ़ी माँगी।
और वही नामदेव जी जब विट्ठल भगवान के दर्शन को गए तो जूते चुरा न जाएँ, यह सोचकर गमछे में बाँधकर कमर से लगा लिए। भजन में खो गए। गाँठ ढीली पड़ी, जूते गिरे। मंदिर के पार्षदों ने जमकर पिटाई की।
अब आप ही बताइए। जो रत्नजटित पलंग नदी में फेंक सकते हैं, उन्हें जूते की चोरी का डर? बुद्धि जवाब नहीं दे सकती। महाराज जी कहते हैं:
"उनको पिटवाना है तो ऐसा करवा दिया, पुजवाना है तो ऐसा कर दिया।"
9:20
माधवदास बाबा जगन्नाथ पुरी में भजन में लगे थे। कई दिन से भोजन नहीं मिला था। जगन्नाथ जी स्वयं भोग की थाल लेकर आए, बाबा को खिलाया, अंतर्ध्यान हो गए। बाबा ने थाल समुद्र में धोकर कुटिया के बाहर रख दी। मंदिर के पार्षद आए। "थाल चुराई?" डंडे बरसाए। भगवान खिलाते भी हैं, अपने ही सेवकों से पिटवाते भी।
फिर एक बार जगन्नाथ जी ने बाबा से कहा, "राजा के बगीचे के कटहल के कोए बड़े अच्छे हैं, चलोगे?" बाबा को पेड़ पर चढ़वाया, खुद नीचे खड़े रहे। कोए तोड़े, बोले "वाह वाह!" भगवान ने कहा "जोर से मत बोलो", और फिर खुद ही बड़े ज़ोर से "वाह वाह!" किया। राज-कर्मचारी दौड़ आए। भगवान अंतर्ध्यान। बाबा पकड़े गए।
सुबह राजा के सामने पेश हुए तो राजा ने साष्टांग प्रणाम किया और पूरा बगीचा जगन्नाथ जी के नाम कर दिया। "कोए आप खाए, बगीचा अपने नाम करवाया, डंडा से पिटवा दिया बाबा को।"
यह भगवान की लीला है। न समझ आती, न समझाई जा सकती। पर इसके पीछे एक गहरा उद्देश्य छिपा है:
"भगवान अपने भक्तों को बुलेट प्रूफ बना देते हैं कि उसके ऊपर संसार का कोई प्रभाव ना पड़े, मान, सम्मान, इसका किसी भी तरह ना पड़े।"
11:16
जैसे काँच को ठंडे-गर्म में बार-बार डालने से बुलेट प्रूफ बनाते हैं, वैसे ही भगवान अपने भक्त को ढालते हैं। और इस ढलाई का साधन एक ही है: निरंतर नाम जप।

नाम जप ही एकमात्र उपाय: माधव की शरण में माया से रक्षा
पायल शर्मा जी जम्मू से पूछती हैं: "मन माया में भटकता है, गलत कर्मों से श्री जी को आहत करता है। क्या करूँ?"
महाराज जी का एक ही जवाब है। बार-बार। बिना थके।
"जिसमें बस एक ही उपाय राधा राधा जपो। तुम प्रसन्न रहो। तुम स्वस्थ रहो। यही हम देख रहे हैं। यही हमें सुख है।"
3:07
साधना करें। नाम जप या लीला-श्रवण। पर उसे भगवान की कृपा मानकर करें। "या गुण साधन ते नहीं होई, तुम्हरी कृपा पाव कोई।" जब साधना को अपनी उपलब्धि मानें तो कहीं-न-कहीं अहम् पुष्ट होता है। और अहम् हो तो दैवी सद्गुण नहीं आते।
कृपा का भाव आया तो अहम् नष्ट होगा। दैवी सद्गुण आएँगे। माया धीरे-धीरे छूटेगी। जो भगवान की शरण में हैं, शरीर को प्रारब्ध भोगना पड़े तो भी मन प्रसन्न रह सकता है। माया भीतर घुस नहीं पाती।
लेकिन माया की सूक्ष्मता यहीं नहीं रुकती। वह भीतर से 'हाँ' मँगवाकर पकड़ती है।
माया की सूक्ष्म पकड़: भीतर की 'हाँ' से कैसे बचें?
यह सबसे टेढ़ी बात है। (मैं भी पहले यही सोचता था कि माया कोई बाहरी चीज़ है जो हमें फँसाती है।) लेकिन महाराज जी ने जो कहा वह दिल में उतर गया:
"माया बाहर से फंसा ले तो बात है, हम अंदर से राजी हो जाते हैं। यार, चलो, ठीक है।"
16:44
यही असली खतरा है। माया बाहर से आती है: कोई परिस्थिति, कोई बात। पर हम भीतर से "ठीक है, चलता है" कहकर उसे मान लेते हैं। बस वहीं से खिसकना शुरू होता है। खसकते-खसकते ऐसी जगह पहुँचते हैं जहाँ विपत्ति आ जाती है।
इससे बचने का तरीका? एक ही है। जब भी भीतर "ठीक है" का भाव उठे, तत्काल "राधा राधा।" साधना को कृपा मानने से अहम् नहीं बनता, और भीतर की 'हाँ' का अवसर नहीं मिलता।
माया बलवती है। उसके पास अनेक बाण हैं। एक काम न किया तो दूसरा, दूसरा ना किया तो तीसरा। वह गिरा के ही मानेगी। इसीलिए भगवान की शरण के अलावा कोई रास्ता नहीं। "जो मेरी शरण में आ गए, वही माया से तर गए।"
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

स्वतंत्र लेखक, jaapak.com
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