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नाम जप में मन लगे तो मिले चिदानंद की झलक

नाम जप में मन लगाने पर चिदानंद की झलक मिलती है — महाराज जी के सत्संग से जानें मन को नाम में कैसे स्थिर करें और भगवान का स्वरूप कैसे प्रकट हो।

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श्री प्रेमानंद जी महाराज — नाम जप में मन की स्थिरता और चिदानंद की झलक | भजन मार्ग सत्संग

कभी माला हाथ में होती है, होंठ हिल रहे होते हैं, लेकिन नाम जप में मन कहीं और चला जाता है। यह अनुभव लगभग हर साधक का है। और यही अनुभव सबसे ज़रूरी सवाल उठाता है: आखिर नाम जप में मन लगाएँ कैसे?

नाम जप में मन क्यों नहीं लगता: असली कारण क्या है?

मन का स्वभाव है भटकना। यह दोष नहीं, यह साधना का प्रारंभिक अनुभव है। जो पहली बार माला हाथ में लेता है, उसे यही लगता है कि "मेरा मन ही खराब है, बस मेरे साथ ऐसा क्यों होता है।" (मैं भी पहले यही सोचता था।) लेकिन सच यह है कि हर साधक इस दौर से गुज़रता है।

असली कारण है: संसार की विकल्प-चिंताएँ। कल का अधूरा काम या घर की कोई परेशानी, मन को जप से दूर खींचती हैं। जप चल रहा है, मन कहीं और है।

महाराज जी का मूल सूत्र यहाँ बहुत साफ है। बैठे-बैठे अगर मन प्रभु में नहीं, तो भक्ति नहीं हो रही। और चलते हुए अगर मन नाम में है, तो भक्ति हो रही है। चिंतन और नाम स्मरण, यही भक्ति का असली स्वरूप है।

इसलिए मन को कोसने की जरूरत नहीं। बस हर बार धीरे से राधा-राधा और वापस ले आओ। बार-बार। यही अभ्यास है।

जब बैठकर जप नहीं होता तो सवाल उठता है: क्या चलते-फिरते, काम करते हुए भी नाम जप संभव है?

चलते-फिरते भी होता है नाम जप: भक्ति की असली परिभाषा

हाँ। और यही असली राहत की बात है।

देवर्षि नारद जी के भक्ति सूत्र की शिक्षा है: हमारा हर आचरण भगवान के अनुकूल हो और उन्हें समर्पित हो। महाराज जी ने एक जिज्ञासु को इसी प्रसंग में जवाब दिया जो कह रहा था, "अब शरीर ठीक से बैठ नहीं पाता, भक्ति कैसे होगी?" महाराज जी ने कहा:

"तदपिता अखिलाचारिता, तद स्मरणन परम व्याकुलते।"

11:30

हर आचरण भगवान को समर्पित। हर पल उनका स्मरण — इतना गहरा कि व्याकुलता हो जाए। यही भक्ति है।

गृहस्थ को बाहर से साधु का भेष नहीं चाहिए। अंदर की सच्चाई असली साधुता है। रसोई में हो या काम पर, हर जगह नाम स्मरण हो सकता है। इसीलिए जब अमित कुमार जी (जो फिल्म लाइन छोड़कर वृंदावन आ गए थे) महाराज जी के पास आए, तो महाराज जी ने कहा:

"साधु बनो। अंदर से साधु बन जाओ और भेष सांसारिक रखो और मेहनत करके कमाओ, खाओ। दूसरों को खवाओ और खूब भजन करो।"

7:56

भैया, भक्ति स्थान-काल की मोहताज नहीं। फावड़ा चलाते हुए या नौकरी करते हुए, अंदर राधा-राधा चलती रहे, यही कसौटी है। चित्त का भगवान की ओर झुकाव, बस यही।

किंतु मन को जप में टिकाए रखने का सबसे बड़ा बाधक है पर-निंदा और व्यर्थ वार्तालाप। यह मन पर पाप का बोझ लादता है।

वृंदावन की भोर में तुलसी के बीच प्राचीन पथ, नाम जप की निरंतरता का प्रतीक
चलते-फिरते भी नाम जप चलता रहे — यही भक्ति की असली परिभाषा है।

निंदा सुनने से मन पर पाप चढ़ता है: व्यर्थ पोटली मत उठाओ

सत्संग में एक सवाल था: "महाराज जी, अगर कोई निंदा कर रहा हो और हम सिर्फ सुन रहे हों, तो क्या हमें भी उतना ही पाप लगता है?"

जवाब था: हाँ।

पर-निंदा करने और सुनने, दोनों से पाप का भार बढ़ता है। और यही ऊर्जा नष्ट होती है जो नाम जप के लिए चाहिए। महाराज जी ने कहा: जब निंदा हो रही हो, कान में अंगुली डालो, राधा-राधा बोलो, उठो और चले जाओ। शास्त्र का सीधा उत्तर है:

पर निंदा के किए ते आवत नहीं कछु हाथ।

मूर्ख पर्वत पाप को ले चल अपने साथ।।

2:23

"वो भला है, बुरा है, जैसा है, भगवान जाने। हमको क्या मतलब?" यह सोच ही मन को हल्का करती है। बेमतलब पाप की पोटरी सिर पर क्यों बाँधें?

और अगर पहले कोई निंदा सुन भी ली हो, उपाय है। भगवान से क्षमा माँगो और तुरंत नाम की शरण लो। मन शांत होगा।

मन को निंदा से बचाकर नाम में स्थिर रखने का फल स्वामी हरिदास जी और तुंग विद्या जी की कथा से जीवंत हो उठता है।

कथा: स्वामी हरिदास जी और चिदानंद स्वरूप का दर्शन

एक जिज्ञासु ने पूछा: "जिसने स्वरूप के दर्शन ही नहीं किए, नाम जप में स्वरूप कैसे आएगा?"

महाराज जी ने कहा: नाम ही करवा रहा है। बिना नाम जप के झाँकी नहीं आती।

स्वामी हरिदास जी का नाम जप इतनी गहराई तक पहुँचा था कि चित्त प्रभु में विलीन हो गया। वे खूब जपते थे, कुंज बिहारी जी की आराधना करते थे। और जब उनके नेत्रों में चिदानंद की क्षमता जागी, तो उन्होंने जो देखा वो साधारण नेत्रों से संभव नहीं था। महाराज जी ने कहा:

"कोटि काम लावण्य बिहारी।"

18:53

करोड़ों काम को भी मूर्छित कर देने वाले बिहारी जी के ऐसे दर्शन तब होते हैं जब नाम जप इतनी गहराई में उतर जाए कि नेत्रों में चिदानंद की शक्ति जाग उठे।

तुंग विद्या जी का प्रसंग भी इसी से जुड़ा है। महाराज जी ने समझाया: जैसे गणित में मानी संख्या रख के सवाल हल होता है, वैसे ही तुंग विद्या जी को मानकर मानसी सेवा में तत्पर हो जाओ। पाषाण मूर्ति हो, चित्रपट हो, प्राकृतिक रूप की किसी भी आराधना से चिदानंद रूप तक पहुँचना संभव है। धीरे-धीरे, नाम जप करते-करते, इंद्रियों की प्राकृतिक क्षमता हटने लगती है। चिदानंद क्षमता आने लगती है।

मुझे लगता है यही इस पूरी शिक्षा का सबसे गहरा बिंदु है। हम जो आराधना कर रहे हैं वो प्राकृतिक रूप की है, लेकिन उसकी मंजिल चिदानंद स्वरूप है।

इन कथाओं से स्पष्ट होता है कि निरंतर नाम जप मन को किस प्रकार निष्पाप कर ब्रह्म स्वरूप में समाहित कर देता है।

नाम जप से मन निष्पाप होकर ब्रह्म स्वरूप में लीन होता है

महाराज जी ने स्पष्ट कहा: "जब हम राधा राधा बहुत जपेंगे, हमारा मन निष्पाप होगा। तब राधा रूप झलकेगा। और जब राधा रूप झलकेगा, तो प्रेममय हो जाओगे।"

साधक भोर के समय ध्यान में, ऊपर से दिव्य स्वर्णिम प्रकाश उतरता हुआ, अंदर के चिदानंद का जागरण
मन निर्मल हो तो चिदानंद की झलक स्वयं उतर आती है।

निरंतर नाम जप से मन के पुराने संस्कार धुलते हैं। जैसे वस्त्र रोज़ धोने से साफ रहता है, वैसे ही नाम जप मन की मलिनता उठाता है। एक अन्य सत्संग में महाराज जी ने यही बात कही: राधा नाम निरंतर लेते-लेते जब मन निष्पाप होता है, हृदय आनंद से भर जाता है। वो आनंद वाणी का विषय नहीं।

और इसका शास्त्रीय आधार है:

"ब्रह्मविद ब्रह्म भवती।"

10:37

जो मन ब्रह्म का चिंतन करे, वह ब्रह्ममय हो जाता है। महाराज जी ने तरंग की उपमा दी: "जैसे तरंग समुद्र में लीन हो गई तो समुद्र हो गई। तरंग का अस्तित्व खत्म।" वैसे ही जीव परब्रह्म में लीन होता है। माया का विकार नष्ट होने पर परमात्मा स्वरूप प्रकट होता है।

चिदानंद स्वरूप की झलक तभी मिलती है जब मन नाम में स्थिर हो। यह साधना की चरम अवस्था है, और इस मार्ग पर चलने वालों के मन में जो प्रश्न बार-बार उठते हैं, उनके उत्तर नीचे हैं।

जप में मलिन विचार आते हैं? घबराओ नहीं, यह सफाई का प्रमाण है

जप शुरू करते हैं और मन में अचानक गंदे विचार आने लगते हैं। देवी-देवताओं की अश्लील कल्पना। पुरानी गलतियों की झलक। "मैं इतना मलिन कैसे हूँ" का अपराध-बोध। और फिर जप ही रुक जाता है।

(मैं भी इसी जगह फँसा था। नाम लेने बैठता तो ऐसे विचार आते कि शर्म से माला हाथ से छूट जाती। लगता था मेरे ही साथ ऐसा हो रहा है, बाकी सब साधक तो शुद्ध मन से जप करते होंगे। फिर एक YouTube वीडियो में किसी संत की वाणी सुनी, नाम याद नहीं रहा। उन्होंने कहा यह बहुत सामान्य अनुभव है। बहुत-बहुत जापकों के साथ होता है। और इसका मतलब बिल्कुल उल्टा है, जो लग रहा है उससे।)

ताम्बे के पात्र में जल की सतह पर उठती धूल, नीचे जमी मलिनता ऊपर आती हुई, शुद्धिकरण का प्रतीक
अंदर की मलिनता बाहर आ रही है, यही शुद्धि का संकेत है।

"गंदगी डिलीट हो रही है", यह नाम का काम है

भजन मार्ग की आधिकारिक शिक्षा इसी पर खुलकर बोलती है। नाम जप एक कड़वी दवा की तरह काम करता है। जब अंदर बैठी पुरानी गंदगी, संस्कार, कुविचार, सब बाहर निकलने लगते हैं। मन का कूड़ा सतह पर आ जाता है। तभी तो वह कल्पना में, सपनों में, ज़ुबान पर दिखता है।

यह गंदगी पहले से अंदर ही थी। जप ने उसे प्रकट किया है, पैदा नहीं किया।

महाराज जी कहते हैं: नाम जप से मन धीरे-धीरे निर्मल होता जाता है। जितना निर्मल होगा, उतना ही अंदर का संसार भी अलग होगा।

क्या करें जब मलिन विचार आते हैं?

  1. रुको मत। यह सबसे ज़रूरी सूत्र है। जप रोकोगे, गंदगी उसी जगह बैठ जाएगी। बस आगे बढ़ो, राधा राधा।
  2. अपने को कोसो मत। "मैं गंदा हूँ", यह मत सोचो। जो साफ हो रहा है, वही दिख रहा है।
  3. विचार से लड़ो मत। लड़ने से वह और मज़बूत होता है। बस उसे "हट" बोलकर नाम पर वापस आओ।
  4. पवित्र हो या अपवित्र, नाम पकड़े रहो। शुद्धि की प्रतीक्षा मत करो। नाम स्वयं शुद्धि कर रहा है।
साधक प्रात:काल ध्यान में, उसके पीछे रक्षक छाया-आकृति कटार उठाये खड़ी, मलिन विचारों से सुरक्षा का प्रतीक
रक्षक की कल्पना, मलिन विचार का सिर कटे और नाम चलता रहे।

एक प्रभावी तकनीक: माँ काली / काल भैरव की रक्षा-कल्पना

विज्ञान भैरव तंत्र में 112 ध्यान-तकनीकें हैं, शिव और भैरवी का संवाद। एक तरीका जो आधुनिक संतों ने भी सुझाया है, बहुत व्यावहारिक है:

कल्पना करो, तुम्हारी पीठ के पीछे माँ काली खड़ी हैं। हाथ में कटार है। या काल भैरव हैं, विकराल रक्षक रूप। जब भी मन में मलिन विचार उठे, कल्पना करो उन्होंने उस विचार का सिर एक झटके में काट दिया।

यह कोई नकारात्मक कल्पना नहीं, यह सुरक्षा-कल्पना है। माँ काली अहंकार और कुविचार की संहारिका हैं। काल भैरव भय और कर्म-बंधन के रक्षक। तंत्र शास्त्र कहता है, काल भैरव सब अशुद्धियों को पी जाते हैं, बिना स्वयं अशुद्ध हुए।

(मैंने यह आज़माया। शुरू में थोड़ा अजीब लगता है। पर हफ़्ते-दस दिन में फर्क महसूस होने लगता है। विचार आते हैं और चले जाते हैं, पहले की तरह पकड़ नहीं बनती। नाम अंदर चलता रहता है।)

बस एक सावधानी: यह कल्पना माँ का अनादर नहीं, उनका सहारा है। भाव में रहो, क्रोध में नहीं।

सबसे बड़ा आश्वासन

यह अनुभव सिर्फ़ तुम्हारा नहीं है। हजारों जापकों ने यही महसूस किया है। महाराज जी, और अन्य संत, सब बार-बार यही समझाते हैं: गंदगी जा रही है, इसलिए दिख रही है।

जप मत रोको। अपने को मत कोसो। माँ की रक्षा का सहारा लो। और राधा राधा कहते रहो।

एक दिन यह सब अपने आप शांत हो जाएगा। और मन में सिर्फ़ नाम बचेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

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Satish Sahu — jaapak.com लेखक
सतीश साहू

स्वतंत्र लेखक, jaapak.com

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इस लेख के बारे में

व्याख्या सनातन परंपरा की सामान्य समझ पर आधारित है और सरल हिंदी में लिखी गई है। किसी आधुनिक टीकाकार का शब्दशः उद्धरण नहीं है।

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