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मन को शांत कैसे करें — नाम जप का सरल उपाय

मन को शांत कैसे करें? श्री प्रेमानंद जी महाराज बताते हैं — नाम जप ही एकमात्र उपाय है। जानें मन की अशांति का असली कारण और नाम जप का सरल अभ्यास।

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श्री प्रेमानंद जी महाराज — मन को शांत करने का उपाय | नाम जप से मन की शांति | भजन मार्ग सत्संग

मन कभी चैन नहीं लेता। सुबह से शाम तक विचारों का तूफान, रात को बिस्तर पर भी वही बेचैनी, और हम सोचते रहते हैं कि मन को शांत कैसे करें। दवाइयाँ, मनोरंजन, योग: सब कुछ आज़माया, पर शांति नहीं मिली।

मन को शांत कैसे करें: नाम जप ही एकमात्र उपाय

मन की अशांति का असली कारण क्या है? महाराज जी कहते हैं: यह विच्छेद है, भगवान से कटा हुआ मन। जब जल अपने स्रोत से अलग हो जाए, तो वह सड़ जाता है। वैसे ही जब मन भगवान से अलग होता है, तो उसमें चैन नहीं रहता।

दवाइयाँ केवल लक्षण दबाती हैं। मनोरंजन कुछ घड़ी के लिए भुला देता है। योग और ध्यान की विधियाँ सहायक हैं, लेकिन जड़ को नहीं काटतीं। जड़ एक ही है: भगवान से अलगाव।

श्री प्रेमानंद जी महाराज के सत्संगों में इस प्रश्न का उत्तर बड़ी सरलता से मिलता है। प्रेम रतरिया जी ने पूछा था: "बाहर के शोर में भी मन में शांति कैसे बनी रहे?" महाराज जी ने सीधे कहा:

"बार-बार भगवान के नाम का इसे स्मरण और दर्शन कराइए मन को। भगवान के नाम में ही इतनी सामर्थ है कि मन को स्थिर कर देगा।"

6:33

नाम जप मन को उसके मूल स्रोत से जोड़ने का उपाय है। जब मन बार-बार "राधा" सुनता है, देखता है, उच्चारण करता है, तो उसे भागने का अवसर ही नहीं मिलता। धीरे-धीरे रुचि जागती है, भाव प्रकट होता है, और स्थिरता आती है।

पर मन इतनी आसानी से नहीं मानता।

मन को वश में करना एक युद्ध है: धैर्य की साधना

मुझे लगता है कि नाम जप शुरू करने वाले हर साधक के मन में यह प्रश्न आता है: "हफ्तों से जप कर रहा हूँ, फिर भी मन शांत नहीं।" (मैं भी पहले यही सोचता था।) यह निराशा स्वाभाविक है, लेकिन महाराज जी का जवाब साफ है:

भोर के समय वृंदावन का शांत मंदिर सरोवर, जिसके स्थिर जल में मंदिर शिखर का दर्पण-सा प्रतिबिंब और घाट की सीढ़ियाँ
जल जैसा स्थिर मन — नाम जप की साधना से यही शांति मिलती है।

"पर ये लड़ाई है! ये एक युद्ध है। इसमें लड़ना पड़ेगा। यह ऐसा नहीं है कि दो चार 10 दिन में कब्जे में आ जाएगा।"

8:06

भैया, मन हमारे जन्मों-जन्मों का अभ्यासी है। वह क्षण में हज़ार दिशाओं में भागता है। इस पुराने अभ्यास को तोड़ने के लिए दीर्घकाल की साधना चाहिए।

और यह लड़ाई अकेले लड़नी है। कोई और नहीं लड़ सकता। गुरु रास्ता दिखाते हैं, पर चलना तो साधक को ही पड़ता है। हार मानना ही एकमात्र असली हार है।

महाराज जी ने कहा: "दीर्घकाल निरंतर।" लंबे समय तक, बिना रुके, अभ्यास करते जाओ। तब "यपमान सिद्धो भवती": साधक सिद्ध हो जाता है। "अमृतो भवती": मृत्यु भय से मुक्त हो जाता है। "तृप्तो भवती": कोई चाह नहीं रह जाती।

नाम जप का नियमित अभ्यास: विपरीत परिस्थितियों में भी

मन भागेगा। यह तय है। काम के बीच में, बातचीत में, नींद से पहले: मन हर बार बाहर जाएगा। इसमें खीझना नहीं है। बस घसीट कर वापस लाना है।

महाराज जी ने कहा:

"इसलिए खूब नाम जप करो। बार-बार जाते हुए मन को घसीट कर नाम में लगाओ। ऐसा अभ्यास करते रहो।"

8:53

एक और सत्संग में महाराज जी ने बताया: भोजन पाते हुए, स्नान करते हुए, बात करते हुए भी नाम चलता रहे। निरंतरता संख्या से ज़्यादा महत्वपूर्ण है। चाहे सौ माला हो या दस, लेकिन नियमित हो, बिना नागा।

अनुकूल स्थिति में तो जप होता है। लेकिन प्रतिकूल में (जब मन कहे "आज मन नहीं है", "आज बहुत थके हैं") तब भी नाम नहीं छोड़ना। यही असली साधना है। बाहर की परिस्थिति बदलती रहती है, नाम का धागा नहीं टूटना चाहिए।

अभ्यास के साथ-साथ एक और सूक्ष्म बात: भोजन और संगति का मन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। एक कथा से समझते हैं।

कथा: सिद्ध बलराम दास बाबा जी और भोजन की शुद्धता

वृंदावन में झाड़ू मंडल के पास, यमुना किनारे, सिद्ध बलराम दास बाबा जी एक पेड़ के नीचे बैठे थे। माताएं और बहनें यमुना जी में स्नान कर रही थीं। और उन वृद्ध, सिद्ध संत के मन में अचानक काम वेदना जाग उठी।

केले के पत्ते पर सात्विक भोग — पीतल के पात्र में खीर पर तुलसी दल, ताज़े फल और जलता मिट्टी का दीपक, पारंपरिक रसोई में
पवित्र आहार से पवित्र मन — यही संत की साधना का मूल रहस्य है।

संत हृदय निष्कपट होता है। उन्होंने तुरंत सभी शिष्यों को बुलाया और कहा: "हम यमुना जी में डूब कर शरीर छोड़ देंगे।" शिष्यों ने पूछा, "महाराज जी, क्यों?" बाबा जी बोले: "पाप दृष्टि हो गई।"

शिष्यों ने तुरंत वृंदावन की परिक्रमा करवाई। वृंदावन धाम की महिमा अपरंपार है: परिक्रमा पूरी होते ही वह कुभाव पूर्णतः नष्ट हो गया।

फिर बाबा जी ने पूछा: "कल का प्रसाद कहाँ से आया था?" पता चला कि गोविंद देव जी मंदिर में कोलकाता की एक वैश्या ने अपने व्यभिचार के धन से भोग लगाया था। वही प्रसाद सिद्ध संत तक पहुँचा था। भोजन का भाव और भावना मन तक पहुँचती है: यहाँ तक कि सिद्ध पुरुष भी इससे अछूते नहीं रहे।

ठाकुर जी ने बाबा जी को समझाया: "हमारा पूरा विश्व ब्रह्मांड है। जो भी भोग लगाएगा हम पाएंगे। लेकिन तुम प्रसाद का केवल किनका लो। भरपेट मत पाओ।"

इस कथा की शिक्षा स्पष्ट है: आहार, संगति, और स्थान की शुद्धता नाम जप की ज़मीन तैयार करती है। बाहरी शुद्धता और नियमित अभ्यास जब साथ चलते हैं, तो शरणागति अपने आप गहरी होती जाती है।

शरणागति कैसे पुष्ट होती है: अन्य आश्रय छोड़ते जाएं

संजय जी नीमच से पूछ रहे थे: "एक वर्ष हो गया शरणागति हुए, कैसे जानें कि वह पुष्ट हो रही है?" महाराज जी का उत्तर सीधा और माप लायक था:

"अन्य आश्रय, अन्य बल, अन्य संबंध, अन्य चिंतन जितना हटता जाएगा, उतने ही शरणागति पुष्ट होती चली जाएगी।"

15:26

जितने बाहरी सहारे हम छोड़ते जाते हैं (पद का, धन का, लोगों की स्वीकृति का), उतनी शरणागति गहरी होती जाती है। एक सरल परीक्षा है: संकट में पहले किसकी याद आती है, भगवान की या दुनिया की?

जब भगवत भाव में मन स्थिर होने लगता है, तो उसके संकेत भी प्रकट होते हैं। निर्भयता और निश्चिंतता आती है, भजन में रुचि बढ़ने लगती है। विपत्ति आए, चाहे जितनी बड़ी, भगवान के प्रति विपरीत भावना नहीं होती। एक अंदरूनी उत्साह बना रहता है।

शरणागति पुष्ट होने का सबसे बड़ा फल है: सब में परमात्मा के दर्शन की क्षमता।

पवित्र मन से सर्वत्र भगवान के दर्शन: नाम जप का परम फल

पांडुरंग जी ने पूछा था: "हर जीव में ईश्वर कैसे देखें, जब प्रतिकूल व्यवहार में यह भावना गायब हो जाती है?" महाराज जी ने बिजली का उदाहरण दिया। AC में ठंडी, हीटर में गर्म: दोनों में बिजली एक ही है। अच्छे और बुरे, दोनों व्यवहारों में परमात्मा की शक्ति एक ही है।

"पवित्र मन से सब में भगवान को देखा जाता है।"

9:42

क्रिया और स्वभाव देखोगे तो परमात्मा ओझल हो जाता है। परमात्मा को देखोगे तो क्रिया और स्वभाव गौण हो जाते हैं। दोनों एक साथ नहीं दिखते, चुनाव करना पड़ता है। और यह चुनाव नाम जप की दीर्घकालीन सिद्धि से आता है।

विद्या विनय संपन्न ब्राह्मण में, कुत्ते में, चांडाल में, हाथी में: एक ही परमात्मा को देखना। यही पंडित की पहचान है। यही नाम जप का परम फल है। मन अब शांत है, क्योंकि वह सर्वत्र अपना घर देख रहा है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

लेखक
Satish Sahu — jaapak.com लेखक
सतीश साहू

स्वतंत्र लेखक, jaapak.com

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इस लेख के बारे में

व्याख्या सनातन परंपरा की सामान्य समझ पर आधारित है और सरल हिंदी में लिखी गई है। किसी आधुनिक टीकाकार का शब्दशः उद्धरण नहीं है।

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