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Jaapak
भगवद्गीताअध्याय 2

अध्याय 2: सांख्ययोग

Sānkhya Yog

इस अध्याय में 11 श्लोक हैं।

  1. 2.11
    अशोच्यान् अन्वशोचस्त्वं: पण्डित और शोक का सच

    अशोच्यान् अन्वशोचस्त्वं का असली मतलब क्या है? श्रीकृष्ण ने जीवन-मृत्यु की जगह 'श्वास का होना-न होना' क्यों कहा — गीता 2.11 की सरल हिंदी व्याख्या।

  2. 2.13
    देहिनोऽस्मिन्यथा देहे — आत्मा अजर, देह नश्वर

    'देहिनोऽस्मिन्यथा देहे' — आत्मा बूढ़ी होती है या देह? गीता 2.13 में धीर पुरुष का वो सत्य जो मृत्यु-भय को मिटाता है।

  3. 2.14
    तितिक्षा — गीता 2.14 में सहनशीलता का असली सिद्धांत

    तितिक्षा का असली अर्थ क्या है? गीता 2.14 में 'मात्रास्पर्श' एक ऐसा रहस्य है जो सुख-दुख को देखने का नज़रिया बदल देता है।

  4. 2.20
    न हन्यते हन्यमाने शरीरे: आत्मा की अजन्मता का सत्य

    'न हन्यते हन्यमाने शरीरे' — गीता 2.20 का वह सत्य जो मृत्यु-भय की जड़ काट देता है। आत्मा के चार गहरे आयामों की सरल व्याख्या।

  5. 2.22
    वासांसि जीर्णानि — शरीर वस्त्र है, असली देही कौन?

    वासांसि जीर्णानि का असली अर्थ क्या है? गीता 2.22 में 'देही' शब्द का वह भेद जो अधिकांश अनुवाद नज़रअंदाज़ करते हैं।

  6. 2.23
    नैनं छिन्दन्ति — आत्मा अविनाशी क्यों? गीता 2.23 सरल अर्थ

    नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि — इस श्लोक का असली अर्थ अधिकांश लोग गलत समझते हैं। गीता 2.23 की सरल हिंदी व्याख्या।

  7. 2.47
    कर्मण्येवाधिकारस्ते — फल का असली सच क्या है?

    कर्मण्येवाधिकारस्ते का मतलब सिर्फ 'फल मत चाहो' नहीं है — इसमें कुछ और गहरा छुपा है। गीता 2.47 का असली अर्थ सरल हिंदी में।

  8. 2.48
    समत्वम् योग उच्यते — योगस्थः का असली मतलब

    'समत्वम् योग उच्यते' का असली अर्थ क्या है? गीता 2.48 में श्रीकृष्ण ने एक ऐसा समीकरण दिया जो योग की पूरी परिभाषा बदल देता है।

  9. 2.50
    योगः कर्मसु कौशलम् — पुण्य का असली सच

    क्या पुण्य कर्म भी बंधन बनाते हैं? गीता 2.50 में 'योगः कर्मसु कौशलम्' का वह अर्थ जो अधिकांश लोग नहीं जानते।

  10. 2.62
    आसक्ति से क्रोध तक — गीता 2.62 का गहरा सच

    आसक्ति से क्रोध तक — मन की यह चार-सीढ़ी प्रक्रिया गीता 2.62 में छुपी है। श्रीकृष्ण बताते हैं: पहला कदम कहाँ से शुरू होता है?

  11. 2.71
    विहाय कामान्यः — निर्मम, निरहंकार की असली शांति

    विहाय कामान्यः का असली अर्थ क्या है? बाहरी त्याग और भीतरी निःस्पृहता में क्या फ़र्क है — गीता 2.71 की सरल हिंदी व्याख्या।